Thursday, May 24, 2012

बनारस के घाट पे 10/4/2012

जीवन के अन्तिम कुछ पल जो तुमने मेरे संग काटे
आभास उसी का रहता है हर पल इस मन मस्तिक पर 
जिन आँखों से दीखता  था मुझको सपने  और अनुशासन 
आज वही  नि ; सब्द एक तक ताके मुझको या कुछ और
जिन हाथो में खेला , संभला ,चला और सदा सर पे देखा
आज वही निष्क्रिय  रहे ​फिर कैसे  मुझको देते आसीर्बाद 
आज तुम्हे अपने कंधे पे पाकर समझा उन कंधो का ब्होझ
जीवन भर भागे उन पैरो से  सब कुछ कर दू अपनों को  
आज वही इन कंधो पे आ अपने  अंतिम पथ की राह निहारे
मुझको ,नहलाना , पहनाना  जाने कितनी बार किया पर 
तुमको अन्तिम नहलाना,पहनाना ये क्यों मेरे साथ किया
उस शरीर के तेज के आगे मेरे सब दुःख भागे जाते थे 
उसकी ज्वाला देखे अब इतने दुःख क्यों कर आते है
मन का बहलाना कुछ भी हो पर सच तो सदा यही है 
तुम अपने अंतिम पथ पे हो और हम अनाथ कहलाते है 
माँ और पिता 
मनु 

   

No comments:

Post a Comment