Friday, December 23, 2011


मेरे किसी भी बात और आह को वो राह देता नहीं है
दिमाग कहता है सब ख़तम पर दिल क्यों जीत जाता है
बस एक अंतिम खंजर की जरुरत थी मेरे दिल को
वो कह गए की हम टूटे टुकड़ो को नहीं मारा करते मनु

फूल और शाख की बात


चन्द रोज़ पहले एक अदभुत सा नज़ारा हुआ
बेज़ुबा की भाषा का थोडा मुझे भी ज्ञान हुआ
फूल और साख की बात सुनने का मौका मिला
जिंदगी प्रशन वाचक होकर फिर मेरे सामने थी
फुल अपनी सुन्दरता और खुसबू का गान करता
साख बड़ी नम्रता से झुककर उसको सदा सुनता
फिर एक रोज़ उसने फूल को अपनी आप बताई
फूल कहा होता अगर साख उसे आकाश ना देता
फूल कैसा दिखता अगर साख उसे आधार ना देता
जीवन के अंतिम स्थल पे भी साख गर तुम्हारे साथ ना होता
फूल वहा भी बिखर ही जाता पर साख हमेशा साथ ही रहता
मनु