Tuesday, October 12, 2010

तलाश

नसीब का शिकवा नहीं है हमको ये दोस्त

दो बूंद भी काफी थी हमारी बरसो की प्यास को

पर सोचा न था यु साथ मे हमारे होगा

पपीहा बन भादो मे भी तरसेंगे ये दोस्त

भुलाना चाह कर भी भुलाना बहुत मुश्किल है

साँस के बिना जिन्दगी ये दोस्त नामुमकिन है

तू गम न कर किसी बात का ये दोस्त अपने जानिब

वो शकस ही कमजोर था समझाना बहुत मुश्किल है

4 comments:

  1. बहुत पसन्द आया
    हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद

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  2. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

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  3. कित्ती अच्छी कविता..बधाई.
    कभी 'पाखी की दुनिया' की भी सैर पर आयें .

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  4. aap behad khubsurat likhte hain..........i mean it......lovely.....chodiye mat likhna../...

    nidhi

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