Wednesday, October 13, 2010

सभत्या

वक़्त इस तरह आदमी बन हर पल मुझको छलता क्यों है
साहिल की रेतो की मानिंद मेरे पावो तले ठहरता क्यों है
सुख और दुख का संगम क्यों और कैसा होता है
दिल मै अन्गारे रख मुख से ठ्डक करता क्यों है

Tuesday, October 12, 2010

तलाश

नसीब का शिकवा नहीं है हमको ये दोस्त

दो बूंद भी काफी थी हमारी बरसो की प्यास को

पर सोचा न था यु साथ मे हमारे होगा

पपीहा बन भादो मे भी तरसेंगे ये दोस्त

भुलाना चाह कर भी भुलाना बहुत मुश्किल है

साँस के बिना जिन्दगी ये दोस्त नामुमकिन है

तू गम न कर किसी बात का ये दोस्त अपने जानिब

वो शकस ही कमजोर था समझाना बहुत मुश्किल है

Tuesday, October 5, 2010

दुःख और कवी

वक़्त की आंधी वक़्त से आकर सब कुछ बहा ले जाती है
फिर रेत पे लीक्खे सबदो की तकदीर भी कोई होती है
वक़्त का भरोसा नहीं कब हाथ से ये वक़्त छुट जाये
हसता इसलिए हु कही हसने की आदत न छुट जाये
साहिल पे खड़े होकर दरिया से डर लगता है
एक आप है जो समुंदर के थपेड़ो की बात करते हो
हम उन उंगलियो की आदत आज भी पाले बैठे है
लड़खड़ाने पे जो मेरा भार खुद खुशी से सह लेती थी
धोखा खाते तो हम भी लिखते प्यार और यार की बाते
पर उस लिखने वाले को क्या लिखे वो ही जाने उसकी बाते
शब्द नहीं मिल पाते है तब हाथ नहीं चल पाते है
जब वक़्त की तेज हवाए हो तो शेर नहीं बन पाते है
काश बना सकता तो बनाता एक एक लम्हा मिलने का
शब्द बनाये तो क्या बनाये दुःख देते है दिल को