Tuesday, July 13, 2010

बेटे के पहली बार पापा बोलने पे ११ जुलाई

जीवन के इस एक पल मै
खुशियों का अम्बार मिले
रिश्ता है ये जन्मो का
उसको भी एहसास मिले
तुम आये संग अपने लाये
खुशियों का अदभुत भंडार
अब तक जीवन नीरस ही था
अब लगता है सब कुछ यथार्थ
सोचकर देखना अच्छा लगता है
कल तुम आये थे
आँखे बंद थी होठ बंद थे
हाथो me था माँ का प्यार
शायद ईश्वर का प्रथम बरदान
माँ का अनचाe भी होता ज्ञान
आँखे खोली मुह को खोला
माँ के हाथो का था झुला
हर कोई जहा पर जाकर
जीवन के हर गम को भुला
फिर कुछ उलटे कुछ पुल्टे होते
कुछ नादानी जिद भी करते
मामा नाना के घर पर
पहली बार घुटनों पे चलते
घर आये तुम कुछ गबराए से
माँ भी आहात थी बरो से
दुनिया मै ऐसे कम ही है
जो आहात न हो अपनों से
फिर तुम बोले पापा पापा
मुह को खोले बाबा बाबा


1 comment:

  1. मनु जी ,कितने सूक्ष्म भाव है इस कविता मे
    बिल्कुल दिल को छु गई....इस भावुक रचना को पेश करने के लिए धन्यवाद आपकी अग्ली कृति का इन्तजार रहेगा ..........

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