Monday, April 5, 2010

suraj

प्रातः भानु को देख उगने का मन करता है
निश्चल, निष्क्रिय अवस्था से उठने का मन करता है
गर्मियों में बादलों से छिपने का मन करता है
सर्दियों में बादलों पर छाने का मन करता है
सब हो सुखी कुछ ऐसा करने का मन करता है
पर
आज का मानव चाह नहीं है उसको दिवाकर की
क्योकि उसकी विवसता का पर्चारक है वो
प्रकर्ति के नियमो का पालक है वो
मनाव को ये पसंद नहीं है क्योकि
नियम बनाकर उनका बिध्वन्षक है वो
उन्ही सबका परिणाम है की भानु
दिखाता है क्रोध भिब्हन दिशाओ में
तब
प्रातः भानु को देखर कर उगने का मन नहीं करता है
निश्छल ,निष्क्रिय अवस्था से उठने का मन नहीं करता है

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