Monday, April 5, 2010

बादल

न जाने इन बादलो से क्यों है मुझे प्यार
कभी कभी ये भी लगते है अपने यार
फिर सोचता हु क्यों होता है ऐसा
क्यों लगते है ये मुझे अपने जैसे
शायद दोनों मै कुछ बात साथ है
बादलो की कभी छह नहीं रही होगी
केवल बनना और फिर बिगड़ जाना
लेकिन मजबूर और विवश है वो
अपनी आदत और पथ बाधाओं से
खली प्रतीत हो पानी भरने की आदत से
इन सिलाओ की पथ बाधाओं से टकरा
खाली हो जाता है कुछ पल रोकर
शायद यही समानता है हम दोनों मै
पर पथ बाधाओं से टकराने के बाद
वो खाली नहीं बैठता जल लेने फिर चलता है
और मेरा रास्ता पुनः बदल जाता है
फिर समझता हु यही अंतर है
बादलो मै और मुझ मानव मन मै
फिर न जाने क्यों नहीं लगते
ये बादल अपने यार और
न ही उमड़ता है मुझे इस पे प्यार




1 comment:

  1. बड़ी ही गहरी सोच वाली कविता है ये ......very
    nice

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