Wednesday, April 28, 2010

भूल

भूल से हर बार यही भूल हम क्यों कर बैठे
क्यों एक बेवफा से वफ़ा हम कर बैठे
एक नयी चोट खाने पर मजबूर हो गए ये बताने को
तेरी हर एक अदा ने रोज रुलाया तेरे इस दीवाने को
तेरी पलके जो कभी झपक गयी सुस्ताने को
इकरारे मोहब्त समझने की भूल कर बैठे
देख लिया मुड़कर भी जो तुने एक बार
सरे गिले शिकवे भुलाने की भूल कर बैठे
होटों को खोल तुने जरा मुस्करा भर दिया
तुझको अपना समझने की भूल कर बैठे
भूल से हर बार यही भूल हम क्यों कर बैठे
क्यों एक बेवफा से वफ़ा हम कर बैठे

1 comment:

  1. बहुत खुबसुरत रचना है ये आपकी .....भावना से ओतप्रोत और हर लफ्ज दिल के दर्द को बेन कर रहा है

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