Wednesday, April 14, 2010

शरद

शरद तेरा स्वागत है
गर्मी से त्रस्त तथा वर्षा से ग्रषित
मानव समाज के इस घर मे
जहा गर्मी से अकुलाये लोगो को
वर्षा ने इस कदर सरोबार किया की
जीवन की डोर को भी मांझी की जरूरत थी
शरद तेरा स्वागत है
पर लालच से परिपूर्ण मानव मन की
एक स्वार्थ भरी विनती स्वीकार करो
गर्मी तथा वर्षा की तरह तुम भी
करना न ग्रसित इस समाज को
क्योकि तुम्हरी मार आज भी
शायद न सह सके भूखा नंगा समाज
जहा किसी को दो वक्त का खाना न हो
तथा कोई प्रक्रति से भी बचने का
रखता हो हर उपाय
शरद तेरा स्वागत है
पर केवल उन चाँद दिनों के लिए
जब तक हो न भयभीत समाज का मानव
शरद तेरा स्वागत है

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