Tuesday, April 6, 2010

नया दौर

ढूध का जला छांछ भी फूंक कर पीता है
इतना तो हमने भी सुना है सबसे
पर वो अगर छांछ पीना ही छोड़ दे तो
यही कुछ हाल है आज के युवा का
फैलते भ्रष्टाचार व आतंकवाद से
आतंकित , स्तब्ध धरासायी हो गया
न कुछ करने की ललक बची है
न कुछ कहने की स्तिथि बची है
पर ढूंढा है रास्ता इन्ही पठारों से
काटना है उन दुर्गम पहाडियों को
जो बने है अवरोध राष्ट्र उन्नति मै
हो जायेंगे ख़तम वो सरे अवरोध
अगर दूध का जला भी एक बार फिर
ढूध पिने की चाह रखता हो





1 comment:

  1. बहुत उम्दा सोच वाली कविता है !!!!!
    और वास्तविकता भी यही है कि आज कि युवा कुछ करना नहीं चाहती .यदि आज कि युवा इनसब का सामना बहादुरी से करे तो हर मुश्किल आसान हो जाय .....

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