Sunday, April 4, 2010

पाया और खोया

मै कल पूरी रात फिर नहीं सोया

क्यों सारी रात फूट कर मै रोया

इतने तो बेदर्द न दिखते थे तुम

जाकर भी जिंदगी से जिंदगी हो गए तुम

तुमने कहा था है नहीं प्यार हमसे फिर

आकर खयालो में ये क्या कह गए तुम

बहुत मुस्किलो से ढूढा था एक एक किनारा

क्यों आकर कर किनारों को बहा ले गए तुम

है अजीब प्यार करने का ढंग तुम्हारा

चाहा और चाह कर भी गैर हो गए तुम

अब चैन की नीद हमको भी सोने दो

कर सके बिस्लेषण अपनी जिन्दगी का

आज पूरी रात फिर नहीं सोऊँगा मै

क्योकि तुमको पाया और तुमको खोया

1 comment:

  1. बहुत अच्छी शुरुआत है ,काफी अच्छा लगा आपकी इस रचना को पढ़ कर.भविष्य में आशा करती हु कि और भी अच्छी रचनाये पढने को मिलेंगी ,आपकी इस कविता को पढ़ कर कुछ पंक्तिया याद आ गई
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    ."क्या भूलू क्या याद करू
    अपनी यादे तुझको सौगात करू
    वादा नही पर एक चाह है दिल मे
    तुमको मिलने को हम फिर आयेंग़े
    इन्हे हम तो कभी ना भूल पायेंगे,
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    शुभकामनाओ के साथ धन्यवाद

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