Thursday, May 24, 2012

बनारस के घाट पे 10/4/2012

जीवन के अन्तिम कुछ पल जो तुमने मेरे संग काटे
आभास उसी का रहता है हर पल इस मन मस्तिक पर 
जिन आँखों से दीखता  था मुझको सपने  और अनुशासन 
आज वही  नि ; सब्द एक तक ताके मुझको या कुछ और
जिन हाथो में खेला , संभला ,चला और सदा सर पे देखा
आज वही निष्क्रिय  रहे ​फिर कैसे  मुझको देते आसीर्बाद 
आज तुम्हे अपने कंधे पे पाकर समझा उन कंधो का ब्होझ
जीवन भर भागे उन पैरो से  सब कुछ कर दू अपनों को  
आज वही इन कंधो पे आ अपने  अंतिम पथ की राह निहारे
मुझको ,नहलाना , पहनाना  जाने कितनी बार किया पर 
तुमको अन्तिम नहलाना,पहनाना ये क्यों मेरे साथ किया
उस शरीर के तेज के आगे मेरे सब दुःख भागे जाते थे 
उसकी ज्वाला देखे अब इतने दुःख क्यों कर आते है
मन का बहलाना कुछ भी हो पर सच तो सदा यही है 
तुम अपने अंतिम पथ पे हो और हम अनाथ कहलाते है 
माँ और पिता 
मनु 

   

Friday, December 23, 2011


मेरे किसी भी बात और आह को वो राह देता नहीं है
दिमाग कहता है सब ख़तम पर दिल क्यों जीत जाता है
बस एक अंतिम खंजर की जरुरत थी मेरे दिल को
वो कह गए की हम टूटे टुकड़ो को नहीं मारा करते मनु

फूल और शाख की बात


चन्द रोज़ पहले एक अदभुत सा नज़ारा हुआ
बेज़ुबा की भाषा का थोडा मुझे भी ज्ञान हुआ
फूल और साख की बात सुनने का मौका मिला
जिंदगी प्रशन वाचक होकर फिर मेरे सामने थी
फुल अपनी सुन्दरता और खुसबू का गान करता
साख बड़ी नम्रता से झुककर उसको सदा सुनता
फिर एक रोज़ उसने फूल को अपनी आप बताई
फूल कहा होता अगर साख उसे आकाश ना देता
फूल कैसा दिखता अगर साख उसे आधार ना देता
जीवन के अंतिम स्थल पे भी साख गर तुम्हारे साथ ना होता
फूल वहा भी बिखर ही जाता पर साख हमेशा साथ ही रहता
मनु

Wednesday, October 13, 2010

सभत्या

वक़्त इस तरह आदमी बन हर पल मुझको छलता क्यों है
साहिल की रेतो की मानिंद मेरे पावो तले ठहरता क्यों है
सुख और दुख का संगम क्यों और कैसा होता है
दिल मै अन्गारे रख मुख से ठ्डक करता क्यों है

Tuesday, October 12, 2010

तलाश

नसीब का शिकवा नहीं है हमको ये दोस्त

दो बूंद भी काफी थी हमारी बरसो की प्यास को

पर सोचा न था यु साथ मे हमारे होगा

पपीहा बन भादो मे भी तरसेंगे ये दोस्त

भुलाना चाह कर भी भुलाना बहुत मुश्किल है

साँस के बिना जिन्दगी ये दोस्त नामुमकिन है

तू गम न कर किसी बात का ये दोस्त अपने जानिब

वो शकस ही कमजोर था समझाना बहुत मुश्किल है

Tuesday, October 5, 2010

दुःख और कवी

वक़्त की आंधी वक़्त से आकर सब कुछ बहा ले जाती है
फिर रेत पे लीक्खे सबदो की तकदीर भी कोई होती है
वक़्त का भरोसा नहीं कब हाथ से ये वक़्त छुट जाये
हसता इसलिए हु कही हसने की आदत न छुट जाये
साहिल पे खड़े होकर दरिया से डर लगता है
एक आप है जो समुंदर के थपेड़ो की बात करते हो
हम उन उंगलियो की आदत आज भी पाले बैठे है
लड़खड़ाने पे जो मेरा भार खुद खुशी से सह लेती थी
धोखा खाते तो हम भी लिखते प्यार और यार की बाते
पर उस लिखने वाले को क्या लिखे वो ही जाने उसकी बाते
शब्द नहीं मिल पाते है तब हाथ नहीं चल पाते है
जब वक़्त की तेज हवाए हो तो शेर नहीं बन पाते है
काश बना सकता तो बनाता एक एक लम्हा मिलने का
शब्द बनाये तो क्या बनाये दुःख देते है दिल को